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न प्राण, न अमरीश पुरी, बॉलीवुड के सबसे बड़े विलेन, 61 बार निभाया एक ही किरदार, बार-बार बनते थे नारद मुनि, दादा थे गिलगित के गवर्नर

Written By: Jaya Dwivedie @JDwivedie Published : Feb 20, 2026 02:27 pm IST, Updated : Feb 20, 2026 02:27 pm IST

ऐसे कम ही एक्टर्स हैं जो पर्दे पर एक ही किरदार अपनी पूरी जिंदगी निभाते रहे हों। बॉलीवुड का एक दिग्गज एक्टर ऐसा है, जिसने एक ही रोल 61 बार किया। वो बॉलीवुड का सबसे दमदार विलेन कहा जाता है और कश्मीर की नामी फैमिली से इनका नाता है।

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Image Source : AIR जीवन।

भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ ऐसे कलाकार हुए हैं, जिन्होंने नायक न होकर भी अपनी एक अमिट पहचान बनाई। एक ऐसे ही दिग्गज अभिनेता थे जीवन। कश्मीर के एक बेहद रसूखदार और अमीर परिवार में ओमकार नाथ धर के रूप में जन्मे जीवन का सफर किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है। उनके दादा कश्मीर के डोगरा राजाओं के शासनकाल में गवर्नर थे, लेकिन विलासिता भरा जीवन छोड़कर जीवन ने कला की अनिश्चित राह चुनी। वो मुंबई आए और उन्होंने एक्टिंग की दुनिया में वो स्थान हासिल किया जो अमरीश पुरी और प्राण जैसे दिग्गजों को भी हासिल नहीं हो सका है।

संघर्ष और शुरुआती सफर

महज 18 साल की उम्र में अभिनय का जुनून लिए जीवन अपनी जेब में सिर्फ 26 रुपये लेकर मुंबई भाग आए थे। उनके दादा इस फैसले के सख्त खिलाफ थे। मुंबई की चकाचौंध के बीच शुरुआती पांच साल उन्होंने एक टेक्नीशियन के तौर पर काम करते हुए बिताए। आखिर में 1935 में फिल्म 'फैशनेबल इंडिया' से उनके अभिनय करियर की शुरुआत हुई। जीवन के करियर की सबसे बड़ी खासियत उनका एक विशिष्ट किरदार था। उन्होंने भक्ति फिल्मों में 'नारद मुनि' का किरदार इतनी शिद्दत से निभाया कि वे इस भूमिका के पर्याय बन गए। अपने 40 साल लंबे करियर में उन्होंने कुल 61 बार नारद मुनि का रोल निभाया, जो अपने आप में एक अनोखा कीर्तिमान है। इस उपलब्धि के लिए उनका नाम 'लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स' में दर्ज किया गया।

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क्रूर विलेन और दर्शकों का गुस्सा

50 और 60 के दशक में जीवन हिंदी सिनेमा के सबसे खूंखार और लोकप्रिय विलेन के तौर पर उभरे। 'मेला', 'नागिन', 'नया दौर' और 'कोहिनूर' जैसी फिल्मों में उनके नेगेटिव किरदारों ने दर्शकों के मन में उनके प्रति वास्तविक नफरत पैदा कर दी थी। उनकी अदाकारी का असर ऐसा था कि एक बार जब वे मुंबई से बाहर किसी इवेंट के लिए गए, तो स्टेशन पर उतरते ही एक महिला ने उन पर अपनी चप्पल फेंक दी थी। यह घटना दिखाती है कि वे अपने नकारात्मक किरदारों को कितनी जीवंतता से निभाते थे। वे अपने दौर में इतने मशहूर थे कि फिल्मों के पोस्टर्स पर हीरो के साथ उनकी तस्वीर भी प्रमुखता से छपती थी, जो उस समय किसी खलनायक के लिए बहुत बड़ी बात मानी जाती थी।

अंतिम दौर और विरासत

70 के दशक तक आते-आते उन्होंने चरित्र भूमिकाएं (सपोर्टिंग रोल्स) निभानी शुरू कर दी थीं। 'अमर अकबर एंथनी' में रॉबर्ट का किरदार हो या 'लावारिस', 'नसीब' और 'सुहाग' जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्में, उन्होंने हर भूमिका में अपनी विशिष्ट आवाज और संवाद अदायगी का जादू बिखेरा। अपने पूरे करियर में 300 से अधिक फिल्मों में काम करने के बाद, साल 1987 में 71 वर्ष की आयु में इस महान कलाकार का निधन हो गया। उनके बेटे किरण कुमार ने भी पिता की विरासत को आगे बढ़ाते हुए अभिनय की दुनिया में नाम कमाया। जीवन आज भी सिनेमा जगत में अपनी उस अनूठी शैली के लिए याद किए जाते हैं, जिसने खलनायक को भी पोस्टर पर जगह दिलाई।

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